सिर्फ कौवे को ही नहीं, इन पांच के लिए भी निकलता है पहला ग्रास! जानिए क्या है पंचग्रास परंपरा
द्वारका न्यूज़ | प्रधान संपादक विक्रम सिंह तोमर | 26 सितंबर 2026

पितृपक्ष में पूर्वजों के स्मरण के साथ जीव-जगत के प्रति करुणा और दायित्व का संदेश देती है पंचग्रास परंपरा
पितृपक्ष हिंदू धर्म में पूर्वजों के प्रति श्रद्धा, कृतज्ञता और स्मरण का महत्वपूर्ण अवसर माना जाता है। इस दौरान श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान जैसे धार्मिक कर्म किए जाते हैं। इसी परंपरा से जुड़ी एक महत्वपूर्ण मान्यता ‘पंचग्रास’ या ‘पंचबलि’ की भी है, जिसमें भोजन का एक हिस्सा अलग-अलग जीवों और देवताओं के लिए अर्पित किया जाता है।
परंपरागत रूप से इसमें चींटी, गाय, कौआ, कुत्ता और देवताओं के लिए अर्पण किया जाता है। धार्मिक परंपरा में इसे केवल कर्मकांड नहीं, बल्कि यह संदेश देने वाली व्यवस्था माना गया है कि मनुष्य के भोजन और संसाधनों पर केवल उसका अधिकार नहीं है। प्रकृति और आसपास रहने वाले जीवों के प्रति भी मनुष्य का दायित्व है। श्राद्ध विधि से जुड़े विवरणों में पंचबलि के रूप में गाय, कौआ, कुत्ता, देव और चींटियों के लिए भोजन निकालने का उल्लेख मिलता है।
पंचग्रास में किसका क्या भाव?
चींटी – छोटे और सूक्ष्म जीवों के प्रति भी दया और सह-अस्तित्व की भावना का प्रतीक मानी जाती है।
गाय – हिंदू परंपरा में गाय को विशेष धार्मिक सम्मान प्राप्त है। उसे भोजन कराना सेवा और श्रद्धा से जोड़ा जाता है।
कौआ – श्राद्ध परंपरा में कौवे को विशेष महत्व दिया जाता है। कई परंपराओं में इसे पितरों तक अर्पण पहुंचने का प्रतीक माना जाता है।
कुत्ता – कुत्ते को भोजन कराना जीवों के प्रति करुणा और सेवा की भावना से जुड़ा माना जाता है।
देवताओं के लिए अर्पण – भोजन का एक हिस्सा देवताओं को समर्पित किया जाता है, जो प्रकृति और दैवी शक्तियों के प्रति कृतज्ञता की भावना को दर्शाता है।
पितृपक्ष कब से कब तक?
2026 में 26 सितंबर को पूर्णिमा श्राद्ध से श्राद्ध पक्ष की शुरुआत मानी जा रही है और 10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या के साथ इसका समापन होगा। सर्वपितृ अमावस्या उन पूर्वजों के लिए विशेष मानी जाती है जिनकी श्राद्ध तिथि ज्ञात न हो या जिनका श्राद्ध किसी कारण से निर्धारित तिथि पर न किया जा सके।
पितृपक्ष की सबसे बड़ी सीख केवल पूर्वजों का स्मरण करना नहीं, बल्कि कृतज्ञता, सेवा, दान और जीव-जगत के प्रति संवेदनशीलता भी है। पंचग्रास परंपरा इसी व्यापक भावना को सामने रखती है कि मनुष्य प्रकृति का अकेला उपभोक्ता नहीं, बल्कि उसके साथ सह-अस्तित्व रखने वाला जीव है।
इसलिए पितृपक्ष में जब परिवार अपने पूर्वजों को श्रद्धापूर्वक याद करता है, तब भोजन का एक अंश दूसरे जीवों के लिए निकालना भी साझा जीवन, करुणा और जिम्मेदारी का प्रतीक माना जाता है।







