इंद्र की उंगली से अमृत की धारा फूट पड़ी। ‘माम’ और ‘धाता’ शब्दों के मेल से ही उस बालक का नाम ‘मान्धाता’ पड़ा।
जन्मदिन और विवाह वर्षगाँठ केवल उत्सव नहीं, अपितु अपनी संस्कृति, संस्कार और ‘स्व’ से जुड़ने का अवसर हैं।