भगवान् श्रीरामकी तीन प्रतिज्ञाएँ

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भगवान् श्रीरामकी तीन प्रतिज्ञाएँ

मया त्रय: कृता: संति नियमा मुनिसत्तम॥
मुखाद्विनिर्गतं वाक्यमेकमेव विनिश्चितम्।
न क्रियते परा पत्नी मनसाऽपि न चिन्तये॥
तथा यं हन्तुमिच्छामि बाणेनैकेन कोपत:।
निहन्यते तदैकेन नान्यं बाणं सृजाम्यहम्॥

श्रीराम कहते हैं- हे मुनिश्रेष्ठ! मैंने तीन नियमों के पालन की दृढ़ प्रतिज्ञा की है। उसमें से पहली बात यह है कि मैंने अपने मुख से निकली बात का अवश्यमेव पालन करने का नियम लिया है। मैं अपने मुख से निकली बात को मिथ्या नहीं होने देता, उसे अवश्य पूर्ण करता हूँ। साथ ही दुबारा मैं उस सम्बन्ध में कोई बात नहीं बदलता हूँ, जो एक बार कह दिया, उसे निश्चित ही पूरा करता हूँ।

मेरी दूसरी प्रतिज्ञा यह है कि सीता के अतिरिक्त अन्य सभी स्त्रियाँ मेरे लिये माता कौशल्या के समान हैं, (मैं पर-स्त्री का मन से भी चिन्तन नहीं करता) मैं सीताके अतिरिक्त किसी अन्यको न तो पत्नी बना सकता हूँ और न ही किसी स्त्रीका मैं मनसे चिन्तन ही करता हूँ।

मेरी तीसरी प्रतिज्ञा यह है कि मैं कोप करके जिसका वध करना चाहता हूँ, उसपर केवल एक ही बाणका प्रयोग करता हूँ, दूसरे बाणका मैं प्रयोग नहीं करता।”

​आनन्द रामायण, विलासकाण्ड, ७।११-१४

Vikram singh tomar
Author: Vikram singh tomar

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