महान भक्त धन्ना जाट सनातन धर्म की पहचान

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धन्नाजीके पिता एक साधुसेवी, सरलहृदय साधारण किसान थे। पढ़े-लिखे तो थे नहीं, पर थे श्रद्धालु। उनके यहाँ प्रायः विचरते हुए साधु-संत आकर एक-दो दिन टिक जाते थे। धन्नाजीकी उस समय पाँच वर्षकी अवस्था थी। उनके घर एक ब्राह्मण पधारे। उन्होंने अपने हाथों कुएँसे जल निकालकर स्नान किया और तब झोलीमेंसे शालग्रामजीको निकालकर उनकी तुलसी, चन्दन – धूप-दीप आदिसे पूजा की।

बालक धन्ना बड़े ध्यानसे पूजा देख रहे थे। उन्होंने ब्राह्मणसे कहा-‘पण्डितजी ! मुझे भी एक मूर्ति दो। मैं भी पूजा करूँगा। भला, जाटके लड़केको शालग्राम तो कौन देने चला था; परंतु बालकहठ करके रो रहा था ब्राह्मणने एक काला पत्थर पास उठाकर देते हुए कहा- ‘बेटा! यही तुम्हारे भगवान् हैं। तुम इनकी पूजा किया करो।’

बालक धन्नाको बड़ी प्रसन्नता हुई। अब वे अपने भगवानको कभी सिरपर रखते और कभी हृदयसे लगाये घूमते खेल-कूद तो उन्हें भूल गया और लग गये भगवानकी पूजामें ब्राह्मणको जैसी पूजा करते उन्होंने देखा था, अपनी समझसे वैसी ही पूजा करनेका आयोजन वे करने लगे। बड़े सबेरे स्नान करके अपने भगवान्को उन्होंने नहलाया चन्दन तो पासमें था नहीं, मिट्टीका तिलक किया भगवान्‌को वृक्षके हरे हरे पत्तेचढ़ाये तुलसीदलके बदले ।

फूल चढ़ाये, कुछ तिनके जलाकर धूप कर दी और दीपक दिखा दिया। हाथ जोड़कर प्रेमसे दण्डवत् की दोपहरीमें माताने बाजरे की रोटियाँ खानेको दीं। धन्नाने वे रोटियाँ भगवान्‌के आगे रखकर आँखें बंद कर लीं। बीच-बीचमें आँखें थोड़ी खोलकर देखते भी जाते थे कि भगवान् खाते हैं या नहीं। जब भगवान्ने रोटी नहीं खायी, तब इन्होंने हाथ जोड़कर बहुत प्रार्थना की इसपर भी भगवान्‌को भोग लगाते न देख इन्हें बड़ा दुःख हुआ। मनमें आया- भगवान् मुझसे नाराज हैं, इसीसे मेरी दी हुई रोटी नहीं खाते। भगवान् भूखे रहें और स्वयं खा लें, यह उनकी समझमें नहीं आ सकता था। रोटी उठाकर वे जंगलमें फेंक आये।

कई दिन हो गये, ठाकुरजी खाते नहीं और धन्ना उपवास करते हैं। शरीर दुबला होता जा रहा है। माता पिताको कुछ पता नहीं कि उनके लड़केको क्या हुआ है, धनाको एक ही दुःख है-‘ठाकुरजी उनसे नाराज हैं, उनकी रोटी नहीं खाते।’ अपनी भूख-प्यासका उन्हें पता ही नहीं। कहाँतक ऐसे सरल बालकसे ठाकुरजी नाराज रहते। बाजरेकी इतनी मीठी प्रेमभरी रोटियोंको खानेका मन उनका कहाँतक न होता।

एक दिन जब धन्नाने रोटियां रखीं थे प्रकट हो गये और लगे भोग लगाने। जब आधी रोटी खा चुके, तब हाथ पकड़ लिया बालक धनाने ठाकुरजी इतने दिनों तो तुम आये नहीं। मुझे भूखों मारा और आज आये तो सब रोटी अकेले ही खा जाना चाहते हो। मैं आज भी भूखों मरूँ क्या? मुझे क्या घोड़ी रोटी भी न दोगे?’

बची हुई रोटियाँ भगवान्ने धन्नाको दे दीं। जिनको सुदामाके चावल द्वारकाके छप्पनभोगसे अधिक मीठे लगे थे, विदुर शाक तथा विदुरपत्नीके केलोंके। छिलके के लोभसे दुर्योधनका सारा स्वागत-सत्कार जिन्होंने ठुकरा दिया था, भीलनीके बेरका स्वाद वर्णन करते जो थकते नहीं थे, उनको उन्हीं प्रेमके भूखे ब्रजराजकुमारको धनाकी रोटियोंका स्वाद लग गया।

अब नियमितरूपसे वैधनाकी रोटियोंका नित्य भोग लगाने लगे।बाल्यकाल समाप्त होनेपर धन्नाजीमें गम्भीरता आयी। भगवान्ने भी इनके साथ अब बालक्रीड़ा करना बंद कर दिया। परम्पराको रक्षाके लिये प्रभुने इन्हें दीक्षा लेनेका आदेश दिया। धन्नाजी वहाँसे काशी गये और वहाँपर श्रीरामानन्दजीसे इन्होंने मन्त्र ग्रहण किया। गुरुदेवकी आज्ञा लेकर ये घर लौट आये।

अब धन्नाजीको सर्वत्र, सबमें अपने भगवान्‌के दर्शन होने लगे। वे उस हृदयहारीको सब कहीं देखते और उसकी स्मृतिमें मग्न रहते। एक दिन पिताने उन्हें खेतमें गेहूँ बोने भेजा। मार्गमें कुछ संत मिल गये। संतोंने भिक्षा माँगी। धन्ना तो सर्वत्र अपने भगवान्‌को ही देखते थे। भूखे संत माँग रहे थे, ऐसे समय चूकनेवाले धन्ना नहीं थे।

जहाँ कोई दीन-दरिद्र भूखसे पीड़ित होकर अन्न माँगते हैं, वहाँ स्वयं भगवान् हमसे सेवा चाहते हैं, यह सदा स्मरण रखनेकी बात है। जो ऐसा अवसर पाकर चूक जाते हैं, उन्हें पश्चात्ताप करना पड़ता है। धन्नाने समस्त गेहूँ संतोंको दे दिया।

‘गेहूँ संतोंको दे दिया – यह जानकर माता-पिता असन्तुष्ट होंगे, उन्हें दुःख होगा!’ इस भयसे धन्नाजीने खेतमें हल घुमाया और इस प्रकार खेत जोत दिया, जैसे गेहूँ बो दिया गया हो। घर आकर उन्होंने कुछ कहा नहीं । परंतु धन्नाने भूमिके खेतमें गेहूँ बोया हो या न बोया हो, उस खेतमें तो बो ही दिया था, जहाँ बोये बीजका भण्डार कभी घटता नहीं। भक्तकी प्रतिष्ठा रखने और उसका महत्त्व बढ़ानेके लिये भगवान्ने लीला दिखायी।

कामदुघा पृथ्वीदेवीने धन्नाके खेतको गेहूँ के पौधोंसे भर दिया। चारों ओर लोग प्रशंसा करने लगे कि इस वर्ष धन्नाका खेत ऐसा उठा है, जैसा कभी कहीं सुना नहीं गया। पहले तो धन्नाजीको लगा कि लोग उनके सूखे खेतके कारण व्यङ्ग करते हैं; पर अनेक लोगों से एक ही बात सुनकर वे स्वयं खेत देखने गये।

जाकर जब हरा-भरा – लहलहाता खेत उन्होंने देखा, तब उनके आश्चर्यका पार नहीं रहा। अपने प्रभुकी अपार कृपा समझकर वे आनन्दनिमग्र होकर भगवान्का नाम लेकर गाते हुए नृत्य करने लगे।
जय जय राम कृष्ण हरि विठ्ठल 🙏⚜️

Vikram singh tomar
Author: Vikram singh tomar

DWARKA NEWS NATIONAL NETWORK

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