अयोध्या के राजा युवनाश्व एक धर्मपरायण और न्यायप्रिय शासक थे। उनके राज में प्रजा सुखी थी, धन-धान्य की कोई कमी नहीं थी, किंतु राजा के मन में एक गहरा दुख था— उनकी कोई संतान नहीं थी। वंश को आगे बढ़ाने के लिए उन्होंने अनेक उपाय किए, लेकिन सब निष्फल रहे।
अंततः वे निराश होकर वन में ऋषियों की शरण में गए। वहाँ महर्षि च्यवन ने उनकी व्यथा सुनकर एक विशेष पुत्रेष्टि यज्ञ का अनुष्ठान किया। इस यज्ञ का उद्देश्य एक ऐसा अभिमंत्रित जल तैयार करना था, जिसे पीकर रानी गर्भधारण कर सकें।
यज्ञ संपन्न होने के बाद, ऋषियों ने उस अभिमंत्रित जल को एक कलश में भरकर वेदी पर रख दिया। उन्होंने निर्देश दिया कि प्रातः काल होने पर रानी इस जल का सेवन करेंगी।
परंतु नियति को कुछ और ही मंजूर था। अर्धरात्रि में राजा युवनाश्व की नींद खुली। उन्हें भीषण प्यास लगी थी। अंधेरे और प्यास की व्याकुलता में वे यज्ञशाला में जा पहुँचे। उन्होंने वहाँ रखा जल कलश देखा और बिना यह जाने कि वह कोई सामान्य जल नहीं बल्कि मंत्रों से सिद्ध किया गया ‘गर्भदायक जल’ है, उसे पूरा पी गए।
प्रातःकाल जब ऋषियों को सत्य का पता चला, तो वे चकित रह गए। उन्होंने कहा, “हे राजन! यह जल तो रानी के लिए था, अब आपके ही उदर से बालक का जन्म होगा।”
समय बीतने पर राजा की बाईं कोख को फाड़कर एक अत्यंत तेजस्वी बालक का जन्म हुआ। बालक सूर्य के समान देदीप्यमान था। राजा युवनाश्व तो जीवित बच गए, लेकिन ऋषियों और देवताओं के सामने विकट समस्या खड़ी हो गई— “इस बालक को दूध कौन पिलाएगा?”
उसी क्षण स्वर्ग के अधिपति देवराज इंद्र वहाँ प्रकट हुए। बालक की दिव्यता देखकर इंद्र मंत्रमुग्ध हो गए। उन्होंने अपनी तर्जनी उंगली बालक के मुख में डाल दी और कहा:
“मामयं धाता!” (अर्थात्: यह बालक मुझे ही अपना रक्षक/माता-पिता मानेगा, मैं ही इसका पोषण करूँगा।)
इंद्र की उंगली से अमृत की धारा फूट पड़ी। ‘माम’ और ‘धाता’ शब्दों के मेल से ही उस बालक का नाम ‘मान्धाता’ पड़ा।
इंद्र के संरक्षण और अमृत पान के कारण मान्धाता बहुत ही अल्प समय में विशालकाय और शक्तिशाली हो गए। उन्होंने धनुर्विद्या और शास्त्रों में निपुणता प्राप्त की।
मान्धाता ने अपनी भुजाओं के बल पर समस्त पृथ्वी को जीत लिया। कहा जाता है कि जहाँ से सूर्य उदय होता है और जहाँ अस्त होता है, वह सारा क्षेत्र मान्धाता के अधीन था।
मान्धाता इतने शक्तिशाली थे कि वे स्वर्ग में इंद्र के साथ आधे सिंहासन पर बैठते थे। उन्होंने लवणपुर के राक्षस मधु (लवणासुर के पिता) को छोड़कर लगभग सभी शत्रुओं को परास्त किया था।
उन्होंने सौ अश्वमेध यज्ञ और सौ राजसूय यज्ञ किए। उनके राज्य में अकाल और दुख का नामोनिशान नहीं था।
:- जब नियति किसी असाधारण व्यक्तित्व को जन्म देना चाहती है, तो वह प्रकृति के नियमों को भी बदल देती है। एक पिता की कोख से जन्म लेकर और साक्षात इंद्र का दूध पीकर, मान्धाता ने सिद्ध किया कि वे केवल एक राजा नहीं, बल्कि एक दिव्य विभूति थे।









