वृंदावन की हरियाली, यमुना का शांत किनारा और ग्वालबालों की हँसी से गूंजता वातावरण… उस दिन भी श्रीकृष्ण अपने सखाओं के साथ खेलते-खेलते गाय चराने निकले थे।🚩
सब कुछ सामान्य था, लेकिन दूर कहीं एक भयानक संकट उनका इंतजार कर रहा था। वह था कंस का भेजा हुआ राक्षस बकासुर, जिसने एक विशाल बगुले का रूप धारण किया था। उसका शरीर पर्वत जैसा बड़ा, चोंच तलवार जैसी तेज और आँखें आग की तरह चमक रही थीं।🚩
जैसे ही वह यमुना किनारे पहुँचा, ग्वालबाल उसे देखकर डर गए। उनकी हँसी अचानक चीखों में बदल गई—“कन्हैया!” लेकिन श्रीकृष्ण शांत खड़े रहे, मानो सब कुछ पहले से जानते हों। अचानक बकासुर ने बिजली की तरह हमला किया और अपनी विशाल चोंच खोलकर श्रीकृष्ण को निगल लिया। यह देखकर सभी ग्वालबाल स्तब्ध रह गए, उनके दिल जैसे रुक गए हों।
लेकिन उसी क्षण लीला शुरू हुई। 🚩
बकासुर के भीतर पहुँचते ही श्रीकृष्ण का शरीर अग्नि की तरह तपने लगा। बकासुर उस दिव्य तेज को सह नहीं पाया और तड़पकर तुरंत श्रीकृष्ण को बाहर उगल दिया। जैसे ही श्रीकृष्ण बाहर आए, उन्होंने बिना देर किए उसकी चोंच को दोनों हाथों से पकड़ लिया और एक जोरदार झटके में उसे दो हिस्सों में फाड़ दिया। पलभर में वह विशाल राक्षस धरती पर गिर पड़ा—अधर्म का अंत हो चुका था।🚩
ग्वालबाल दौड़कर श्रीकृष्ण के पास आए, कोई उन्हें गले लगा रहा था, कोई खुशी के आँसू बहा रहा था। आकाश से देवताओं ने पुष्प वर्षा की और चारों ओर “जय श्रीकृष्ण” की गूंज फैल गई।🙏
🌼 संदेश: बुराई चाहे कितनी भी बड़ी क्यों न हो, सत्य और धर्म के सामने टिक नहीं सकती। सच्चे विश्वास के साथ भगवान को याद करने वाला कभी अकेला नहीं होता। 🚩









