20 जुलाई छात्र प्रदर्शन में पैलेट गन के इस्तेमाल का आरोप, क्या है ‘ब्लाइंड वेपन’? भारत में प्रतिबंधित है या नहीं?
द्वारका न्यूज़ प्रधान संपादक विक्रम सिंह चौहान 26 जुलाई 2026
नई दिल्ली |

20 जुलाई को सीजेपी (CJP) के ‘चलो संसद’ मार्च के दौरान प्रदर्शनकारी छात्रों पर पैलेट गन के इस्तेमाल का आरोप सामने आया है। छात्र संगठनों और विपक्षी दलों का दावा है कि प्रदर्शन के दौरान पुलिस ने पैलेट गन का उपयोग किया, जबकि दिल्ली पुलिस और केंद्र सरकार ने इन आरोपों से इनकार किया है।
इस मुद्दे ने एक बार फिर पैलेट गन के इस्तेमाल और इसके मानवाधिकार संबंधी प्रभावों पर बहस तेज कर दी है।
क्या होती है पैलेट गन?
पैलेट गन एक विशेष प्रकार की बंदूक होती है, जो एक कारतूस के माध्यम से धातु या कांच के सैकड़ों छोटे-छोटे छर्रे (Pellets) दागती है। एक कारतूस में लगभग 50 से 500 तक छर्रे हो सकते हैं, जो ट्रिगर दबाते ही बड़े क्षेत्र में फैल जाते हैं।
सुरक्षा बल इसे आमतौर पर भीड़ नियंत्रण के लिए इस्तेमाल करते हैं और इसे कम घातक (Less-Lethal) हथियार माना जाता है।
‘ब्लाइंड वेपन’ क्यों कहा जाता है?
मानवाधिकार संगठनों ने पैलेट गन को ‘ब्लाइंड वेपन’ (Blind Weapon) का नाम दिया है, क्योंकि इसके छर्रे आंखों में लगने पर स्थायी रूप से दृष्टि जाने (अंधापन) का खतरा रहता है। इसके अलावा चेहरे, सिर और शरीर के अन्य हिस्सों में भी गंभीर चोट लग सकती है।
भारत में प्रतिबंधित है क्या?
नहीं। भारत में पैलेट गन पर पूरी तरह प्रतिबंध नहीं है। हालांकि इसके इस्तेमाल को लेकर लंबे समय से विवाद होता रहा है। विशेष रूप से जम्मू-कश्मीर में विरोध प्रदर्शनों के दौरान इसके उपयोग पर सवाल उठने के बाद केंद्र सरकार ने वैकल्पिक भीड़ नियंत्रण उपकरणों की तलाश के लिए एक समिति बनाई थी।
समिति की सिफारिश पर मिर्च के तीखे अर्क (PAVA) वाले गोले जैसे विकल्पों को भी मंजूरी दी गई थी, ताकि गंभीर चोटों की संभावना कम की जा सके।
फिलहाल विवाद क्यों?
20 जुलाई के छात्र प्रदर्शन के बाद सोशल मीडिया पर कई वीडियो और तस्वीरें वायरल हुईं, जिनमें प्रदर्शनकारियों ने पैलेट गन के इस्तेमाल का आरोप लगाया। हालांकि दिल्ली पुलिस और केंद्र सरकार ने इन दावों को खारिज किया है। मामले को लेकर राजनीतिक बयानबाजी और जांच की मांग जारी है।






