अमृत 2.0 में ‘स्टीकर घोटाले’ के आरोपों से मचा हड़कंप
द्वारका न्यूज़ | प्रधान संपादक विक्रम सिंह तोमर | 24 सितंबर 2026

करोड़ों की जल परियोजनाओं में महंगे विदेशी सेंसर की जगह लोकल उपकरण लगाने का दावा, जांच की जरूरत
भोपाल। मध्य प्रदेश में घर-घर स्वच्छ पेयजल पहुंचाने के लिए संचालित अमृत 2.0 योजना से जुड़ी जल परियोजनाओं में कथित गड़बड़ी का मामला सामने आया है। दैनिक भास्कर की एक इन्वेस्टिगेशन रिपोर्ट में दावा किया गया है कि प्रदेश के कई वाटर ट्रीटमेंट प्लांट में निर्धारित ब्रांडेड सेंसर की जगह कथित तौर पर सस्ते लोकल सेंसर लगाए गए और उन पर नामी विदेशी कंपनियों के स्टीकर चिपकाए गए।
रिपोर्ट के मुताबिक प्रदेश में अमृत 2.0 के तहत 622 जलप्रदाय परियोजनाओं को मंजूरी दी गई है, जिनकी कुल अनुमानित लागत करीब 12 हजार करोड़ रुपये बताई गई है। इन परियोजनाओं में प्लांट की निगरानी और संचालन के लिए SCADA सिस्टम महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसी सिस्टम के जरिए पानी की गुणवत्ता, क्लोरीन, pH स्तर और दबाव जैसी अहम जानकारियों की निगरानी की जाती है।
महंगे सेंसर की जगह सस्ते उपकरण लगाने का आरोप
जांच रिपोर्ट में दावा किया गया है कि कुछ वाटर ट्रीटमेंट प्लांट में जर्मनी और स्विट्जरलैंड की स्वीकृत कंपनियों के सेंसर लगाए जाने के बजाय स्थानीय स्तर पर निर्मित सस्ते उपकरण लगाए गए। आरोप यह भी है कि इन उपकरणों पर ब्रांडेड कंपनियों के नाम वाले स्टीकर लगाए गए, जिससे वे प्रथम दृष्टया महंगे उपकरण जैसे दिखाई दें।
जानकारों के अनुसार जल परियोजनाओं में SCADA और ऑटोमेशन सिस्टम की लागत परियोजना के आकार और क्षमता के अनुसार काफी अधिक हो सकती है। एक प्लांट में इसकी लागत लाखों रुपये तक पहुंचने की बात सामने आई है। ऐसे में महंगे और सस्ते उपकरणों के बीच कीमत का अंतर जांच का महत्वपूर्ण बिंदु बन सकता है।
कंसल्टेंट और इंजीनियरों की भूमिका पर भी सवाल
कथित गड़बड़ी में संबंधित कंसल्टेंट और इंजीनियरिंग स्टाफ की भूमिका को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। यदि निर्धारित स्पेसिफिकेशन के विपरीत उपकरण लगाए गए हैं, तो उनकी तकनीकी जांच और स्वीकृति देने वाली प्रक्रिया की भी जांच जरूरी होगी।
सबसे गंभीर सवाल पेयजल की गुणवत्ता और ऑटोमेटेड मॉनिटरिंग को लेकर है। सेंसर पानी के विभिन्न मानकों की निगरानी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यदि उपकरण निर्धारित मानकों के अनुरूप काम नहीं करते हैं तो प्लांट के संचालन और निगरानी की विश्वसनीयता प्रभावित हो सकती है।
12 हजार करोड़ की परियोजनाओं पर उठे सवाल
अमृत 2.0 जैसी बड़े पैमाने की योजना में यदि उपकरणों की गुणवत्ता और खरीद प्रक्रिया में अनियमितता के आरोप सही पाए जाते हैं, तो यह केवल वित्तीय अनियमितता का मामला नहीं रहेगा, बल्कि सार्वजनिक पेयजल व्यवस्था की गुणवत्ता से भी जुड़ जाएगा।
अब सवाल यह है कि प्रदेश में कितने वाटर ट्रीटमेंट प्लांट में ऐसे उपकरण लगाए गए, उनकी खरीद किस कंपनी से हुई, तकनीकी स्वीकृति किस स्तर पर दी गई और भुगतान से पहले उपकरणों का स्वतंत्र परीक्षण कराया गया या नहीं।
मामले में निष्पक्ष तकनीकी जांच, उपकरणों की लैब टेस्टिंग, खरीद दस्तावेजों के सत्यापन और जिम्मेदार अधिकारियों-कंसल्टेंट की भूमिका की जांच से ही वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।







