उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर इतिहास
द्वारकाधीश नेशनल नेटवर्क
प्रधान संपादक विक्रम सिंह तोमर
(Mahakaleshwar Jyotirlinga) भारत के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है, जो शिप्रा नदी के किनारे स्थित है। मान्यतानुसार यह स्वयंभू लिंग है, जिसे ब्रह्मा जी ने स्थापित किया था। यह दक्षिणमुखी होने के कारण तांत्रिक परंपरा में विशिष्ट है। 13वीं सदी में इल्तुतमिश द्वारा नष्ट किए जाने के बाद, 18वीं सदी में मराठा शासकों ने इसका पुनरुद्धार किया।
महाकालेश्वर मंदिर के इतिहास के मुख्य बिंदु:
- पौराणिक कथा: शिव पुराण के अनुसार, उज्जैन के राजा चंद्रसेन और गोप बालक की भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने महाकाल के रूप में दर्शन दिए और यही निवास करने का वरदान दिया।
- दक्षिणमुखी महत्व: यह देश का एकमात्र दक्षिणमुखी ज्योतिर्लिंग है, जो \’महाकाल\’ (काल के भी काल) के रूप में प्रसिद्ध है।
- इतिहास: परमार काल में भव्य मंदिर था, लेकिन 1234-35 में इल्तुतमिश ने इसे नष्ट कर दिया।
- जीर्णोद्धार (Reconstruction): 18वीं सदी (1732) में मराठा सरदार राणोजी राव सिंधिया और उनके दीवान रामचंद्र सुकथनकर ने मंदिर का पुनर्निर्माण करवाया।
- स्थापत्य: मंदिर तीन मंजिलों में है – मुख्य महाकाल, ओंकारेश्वर और नागचंद्रेश्वर।
- विशिष्टता: यह मंदिर तंत्र साधना का बड़ा केंद्र है और भस्म आरती विश्व प्रसिद्ध है।
महाकाल को उज्जैन का राजा माना जाता है, और यह मान्यता है कि राजा विक्रमादित्य के बाद से कोई भी राजा या नेता यहां रात में नहीं









