सुप्रीम कोर्ट ने 11 मार्च 2026 को ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए देश में पहली बार गाजियाबाद के 31 वर्षीय हरीश राणा को ‘पैसिव यूथेनेशिया’ (Passive Euthanasia) यानी निष्क्रिय इच्छा मृत्यु की मंजूरी दी है। 13 साल से कोमा और 100% दिव्यांगता के कारण वह बिस्तर पर अचेत थे, जिसके बाद उनके परिवार ने यह याचिका दायर की थी।
मुख्य तथ्य:
देश में पहली बार इच्छा मृत्यु (Euthanasia) की इजाजत
द्वारका न्यूज़ नेशनल नेटवर्क
प्रधान संपादक विक्रम सिंह तोमर
गंभीर और असहनीय पीड़ा से जूझ रहे मरीजों को अब कानूनी प्रक्रिया के तहत इच्छा मृत्यु का अधिकार
समाचार:
भारत में पहली बार इच्छा मृत्यु (यूथेनेशिया) को लेकर बड़ा फैसला सामने आया है। Supreme Court of India ने गंभीर रूप से बीमार और असहनीय पीड़ा झेल रहे मरीजों के लिए कुछ शर्तों के साथ इच्छा मृत्यु की अनुमति दी है। इस फैसले के बाद अब ऐसे मरीज, जिनके ठीक होने की संभावना बहुत कम है और जो लंबे समय से अत्यधिक कष्ट में हैं, वे कानूनी प्रक्रिया के तहत जीवन समाप्त करने की अनुमति मांग सकते हैं।
अदालत ने स्पष्ट किया है कि यह प्रक्रिया सख्त नियमों और मेडिकल बोर्ड की जांच के बाद ही लागू होगी, ताकि किसी भी प्रकार के दुरुपयोग को रोका जा सके।
📌 मुख्य बातें:
गंभीर और लाइलाज बीमारी वाले मरीजों को राहत
मेडिकल बोर्ड और कानूनी प्रक्रिया जरूरी
मरीज की स्पष्ट सहमति अनिवार्य
पहला मामला: यह भारत के इतिहास में कोर्ट द्वारा दी गई पैसिव यूथेनेशिया की पहली प्रत्यक्ष अनुमति है, जिसमें लाइफ सपोर्ट सिस्टम (जीवन रक्षक प्रणाली) को हटाया जाएगा।
मरीज: हरीश राणा 2013 में यूनिवर्सिटी की चौथी मंजिल से गिर गए थे, जिससे उनके सिर में गंभीर चोट लगी थी।
मेडिकल रिपोर्ट: AIIMS की रिपोर्ट में रिकवरी की कोई संभावना न होने की पुष्टि के बाद कोर्ट ने यह फैसला सुनाया।
कानूनी स्थिति: 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया को निजता के अधिकार के तहत कानूनी मान्यता दी थी, लेकिन यह पहला मामला है जब इसका व्यावहारिक क्रियान्वयन हो रहा है।
इस मामले में कोर्ट ने लाइफ सपोर्ट सिस्टम को चरणबद्ध तरीके से हटाने का निर्देश दिया है।







