ये कैसी आस्था है जो अपने ही धर्म और प्रकृति के साथ खिलवाड़ कर रही है। हिंदू धर्म के किसी ग्रंथ में नदी में घी डालने का न तो उल्लेख है, न ही किसी धार्मिक अनुष्ठान में ऐसा कोई विधान बताया गया है।
सच तो यह है कि ऐसी परंपराएँ अक्सर स्वार्थी व्यक्ति द्वारा स्वार्थ के उद्देश्य से शुरू की जाती हैं और धीरे-धीरे आस्था का रूप ले लेती हैं।
नदी में सैकड़ों लीटर घी डालना पवित्रता नहीं, बल्कि सीधा प्रदूषण है। घी पानी में घुलता नहीं और सतह पर परत बनाकर ऑक्सीजन को रोक देता है, जिससे मछलियाँ और जलीय जीवन प्रभावित होते हैं। समय के साथ यह सड़कर बदबू और गंदगी भी फैलाता है।







