भक्त गोविन्द दास की अनन्य निष्ठा और श्री राधा कृष्ण कृपा

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भक्त गोविन्द दास की अनन्य निष्ठा और श्री राधा कृष्ण

बरसाना के रहने वाले गोविन्द दास एक परम भगवद भक्त थे। उनके परिवार में उनकी पुत्री मुनिया के अलावा कोई नहीं था। वे दिन भर मेहनत से अपना काम करते और शाम को श्री जी (राधा रानी) के मंदिर जाकर दर्शन और संतों की सेवा में समय व्यतीत करते थे। सत्संग और सेवा ही उनके जीवन का मुख्य आधार था। एक बार एक वृद्ध और बीमार संत की सहायता के लिए गोविन्द दास उन्हें नन्दगाँव छोड़ने को तैयार हो गए। रास्ते में अपनी बीमारी के कारण संत बार-बार रुकते रहे, जिससे यात्रा में काफी समय लग गया। नन्दगाँव पहुँचकर जब संत ने गोविन्द दास को जलपान के लिए कहा, तो उन्होंने बड़े ही भावुक मन से मना कर दिया। ब्रज की लोक-मर्यादा के अनुसार, बरसाना की लाड़ली (राधा जी) नन्दगाँव में ब्याही गई थीं, इसलिए बरसाना का कोई भी वासी नन्दगाँव का पानी पीना पाप समझता था। उनकी यह अटूट श्रद्धा देखकर संत की आँखों में आंसू आ गए।

वापसी में तपती दोपहर और चिलचिलाती धूप के कारण गोविन्द दास की हालत बिगड़ गई। भूख, प्यास और थकान से चूर होकर वे एक पेड़ के नीचे अचेत (बेहोश) होकर गिर पड़े। उनकी यह दशा देखकर स्वयं भगवान कृष्ण द्रवित हो उठे। कान्हा ने विचार किया कि गोविन्द दास श्री राधा जी के परम भक्त हैं, अतः उनकी रक्षा का अधिकार और दायित्व उन्हीं का है।

भगवान कृष्ण दौड़ते हुए राधा रानी के पास पहुँचे और विनोदपूर्ण ढंग से कहा कि तुम्हारे “पिताजी” डगर में पड़े हैं। पूरी बात समझने के बाद, राधा जी ममतामयी होकर गोविन्द दास की पुत्री ‘मुनिया’ का रूप धारण कर भोजन और जल लेकर पहुँचीं। उन्होंने अपने हाथों से गोविन्द दास को जल पिलाया और भोजन कराया। राधा जी ने यह बहाना बनाया कि घर पर ‘हरिया काका’ आए हैं और वे मेहमानों को सँभालने वापस जा रही हैं।

जब गोविन्द दास शाम को घर लौटे और अपनी पुत्री मुनिया को धन्यवाद दिया, तब मुनिया ने बताया कि वह तो पूरे दिन घर से बाहर ही नहीं गई और न ही कोई हरिया काका आए थे। यह सुनते ही गोविन्द दास स्तब्ध रह गए। उन्हें तुरंत आभास हो गया कि उनकी रक्षा के लिए स्वयं किशोरी जी (श्री राधा) आई थीं। वे इस ग्लानि में डूब गए कि उनकी सेवा के कारण उनकी आराध्या को इतनी भयंकर गर्मी में कष्ट उठाना पड़ा और वे उन्हें पहचान भी न सके।

:- जब भक्त मर्यादा और नियम का पालन पूर्ण निष्ठा से करता है, तो स्वयं भगवान और उनकी शक्ति (राधा रानी) साधारण रूप धारण कर उसकी सहायता के लिए दौड़ पड़ते हैं। भक्त की मर्यादा भगवान की जिम्मेदारी बन जाती है।

* राधे राधे।

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Vikram singh tomar
Author: Vikram singh tomar

DWARKA NEWS NATIONAL NETWORK

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