प्राचीन काल में जब पृथ्वी पर सर्पों का आतंक बहुत बढ़ गया था और कद्रू के पुत्रों (नागों) से ऋषि-मुनि त्रस्त थे, तब महर्षि कश्यप ने ब्रह्मा जी की सलाह पर एक ऐसी देवी का आह्वान किया जो सर्पों को नियंत्रित कर सके। महर्षि कश्यप ने अपने ‘मन’ के योग और तपस्या से एक कन्या को जन्म दिया, इसीलिए उनका नाम ‘मनसा’ पड़ा।
जन्म के बाद देवी मनसा ने भगवान शिव की कठोर तपस्या की। शिव जी ने प्रसन्न होकर उन्हें दर्शन दिए, उन्हें समस्त सिद्धियों का ज्ञान कराया और वे ‘शम्भुशिष्या’ कहलाईं। उन्होंने ही मनसा देवी को वह शक्ति दी जिससे वे विष को नियंत्रित कर सकें।
देवी मनसा का विवाह महर्षि जरत्कारु के साथ हुआ। यह विवाह एक शर्त पर आधारित था, लेकिन बाद में कुछ मतभेदों के कारण ऋषि जरत्कारु उन्हें छोड़कर चले गए। उस समय मनसा देवी गर्भवती थीं। उन्होंने एक पुत्र को जन्म दिया जिनका नाम आस्तीक रखा गया। आस्तीक मुनि ने ही आगे चलकर राजा जनमेजय के ‘सर्प मेध यज्ञ’ को रुकवाकर नागों के वंश की रक्षा की थी।
जब राजा जनमेजय ने अपने पिता परीक्षित की मृत्यु का बदला लेने के लिए दुनिया के सभी सर्पों को यज्ञ की अग्नि में भस्म करना शुरू किया, तब चारों ओर त्राहि-त्राहि मच गई।
उस समय नागों के भय को दूर करने और विष के प्रभाव को समाप्त करने के लिए इस स्तोत्र की महिमा बताई गई। भगवान नारायण ने स्पष्ट किया कि जो भी व्यक्ति मनसा देवी की स्तुति करेगा, उसे न केवल सर्प दंश से मुक्ति मिलेगी, बल्कि देवी उसकी संतानों की भी रक्षा करेंगी।
देवी मनसा को विषहरी भी कहा जाता है क्योंकि वे विष को हरने वाली हैं। बंगाल और उत्तर भारत के कई क्षेत्रों में उनकी पूजा लोक देवी के रूप में बहुत श्रद्धा से की जाती है।









