????????।।गायत्री मंत्र विशेष।।????????
द्वारका न्यूज़
प्रधान संपादक विक्रम सिंह तोमर
वैदिक सनातन धर्म में गायत्री मंत्र का बहुत महत्वपूर्ण स्थान है। गायत्री मंत्र को वेदों का प्राण स्वरूप ही कहा जाता है। गायत्री मंत्र के जप से इहलौकिक और पारलौकिक सभी कामनाओं की पूर्ति हो जाती है। इसमें कोई संशय नहीं है।
परंतु गायत्री मंत्र के जप के विषय में शास्त्रों में कुछ निर्देश प्राप्त होते हैं जिसका पालन करना आवश्यक है
1) गायत्री मंत्र का जप करने वाले साधक को यज्ञोपवीत और शिखाधारी अवश्य होना चाहिए बिना यज्ञोपवित और शिखा के गायत्री मंत्र जप का अधिकार किसी को नहीं है।
2) गायत्री मंत्र को बहुत धीरे उच्चरित करना चाहिए इतने धीरे की बाजू वाले को भी सुनाई ना दे सिर्फ होठ हीले
3) गायत्री मंत्र को श्राप विमोचन के बाद ही जपना चाहिए
4) गायत्री मंत्र को शुद्ध स्थान में शुद्ध वस्त्र पहनकर शुद्ध अवस्था में ही जपने का अधिकार है
परंतु वर्तमान समय में ऐसी घोर विडंबना आ गई है कि स्कूलों में जूते पहनकर बच्चे जोर-जोर से इसका जाप करते हैं।
गायत्री मंत्र उच्चरित करते समय यज्ञोपवीत और शिखा का ध्यान तो किसी को रहा ही नहीं है।
शमशान आदि अपवित्र स्थान में व्यक्ति भी गायत्री मंत्र का जाप करते हैं
परंतु एक बात ध्यान देने योग्य है कि शास्त्रों में स्पष्ट आदेश है की विधि के साथ सिद्ध की हुई गायत्री सब भोगो को प्रदान करने वाली होती है वही गलत तरीके से जपी हुई गायत्री शक्ति विद्या और लक्ष्मी का नाश करती है यथार्थ कल्याणकारी नहीं होती।
वर्तमान कलियुग में शुद्ध तरीके से गायत्री का जप करना बहुत मुश्किल है
इसलिए करपात्री जी महाराज कहां करते थे की जिनको भी गायत्री मंत्र के लाभ की इच्छा हो
उन्हें मानस गायत्री का जाप करना चाहिए मानस गायत्री में सभी का अधिकार है और उसे किसी भी परिस्थिति में जपा जा सकता है
और दोनों के जप का फल समान है इसमें कोई अंतर नहीं है
मानस गायत्री निम्नलिखित है-:
????????जनकसुता जग जननि जानकी। अतिसय प्रिय करुनानिधान की॥
ताके जुग पद कमल मनावउँ। जासु कृपाँ निरमल मति पावउँ॥4॥????????









