तिरुपति बालाजी (वेंकटेश्वर स्वामी) की पौराणिक कथा भगवान विष्णु के पृथ्वी पर मानव रूप में अवतरित होने और माता लक्ष्मी (पद्मावती) से विवाह से जुड़ी है। यह कहानी कलियुग में भक्तों के कल्याणकुबेर से ऋण लेने और उनके तिरुमाला की सात पहाड़ियों पर स्वयंभू मूर्ति के रूप में स्थापित होने का वर्णन करती है।


तिरुपति बालाजी की मुख्य पौराणिक कथा:
भगवान विष्णु का अवतार: मान्यता के अनुसारकलियुग के प्रभाव को कम करने और भक्तों की रक्षा के लिए भगवान विष्णु ने वेंकटेश्वर रूप में तिरुमाला (आंध्र प्रदेश) में अवतार लिया।
पद्मावती से विवाह: भगवान श्रीनिवास (वेंकटेश्वर) ने राजा आकाशराज की पुत्री पद्मावती से विवाह किया। इस विवाह के लिए उन्होंने कुबेर देवता से बहुत धन उधार लिया था।
ऋण चुकाने की परंपरा: मान्यता है कि भगवान वेंकटेश्वर आज भी कुबेर का वह कर्ज चुका रहे हैं। इसीलिए भक्त अपने धन का दान (हुंडी) के रूप में तिरुपति बालाजी मंदिर में अर्पित करते हैं ताकि भगवान अपना कर्ज चुका सकें।
सप्तगिरि और वैकुंठ: यह मंदिर सात पहाड़ियों (सप्तगिरि) पर स्थित है और इसे धरती का वैकुंठ माना जाता है।
बालाजी के रहस्य: भगवान की मूर्ति को स्वयंभू माना जाता हैऔर कहा जाता है कि इस पर आज भी पसीना आता हैइसलिए मंदिर का तापमान कम रखा जाता है।
जिस नगर में यह मंदिर बना है उसका नाम तिरूपति है और नगर की जिस पहाड़ी पर मंदिर बना है उसे तिरूमला (श्री+मलय) कहते हैं. तिरूमला को वैंकट पहाड़ी अथवा शेषांचलम भी कहा जाता है. यह पहाड़ी सर्पाकार प्रतीत होती है जिसकी सात चोटियां हैं जो आदि शेष के फनों की प्रतीक मानी जाती हैं.
तिरुपति बालाजी मंदिर का रहस्य
गुरुवार को भगवान वेंकेटेश्वर को चंदन का लेप लगाया जाता है जिसके बाद अद्भुत रहस्य सामने आता है. जब इस लेप को हटाया जाता है तो भगवान वेंकेटेश्वर के हृदय में माता लक्ष्मी जी की आकृति दिखाई देती है.
भगवान वेंकेटेश्वर की मूर्ति पर कान लगाकर सुनें तो समुद्र की लहरों की ध्वनि सुनाई देती है.
यह मंदिर न केवल एक पवित्र तीर्थ स्थल हैबल्कि अपनी समृद्ध परंपराओं और भक्तों के अटूट विश्वास का प्रतीक भी है।
इस यात्रा में विक्रम सिंह तोमर निरंजन शर्मा नित्यानंद त्रिपाठी और दिलीप धाकड़ शामिल है









