गुना में धर्मांतरण का खेल अंधविश्वास की नई दुकान — बकरे-मुर्गे का भोज, चंगाई का पाखंड और टूटे आदिवासियों की आस्था का सौदा
द्वारका न्यूज़ नेशनल नेटवर्क
प्रधान संपादक विक्रम सिंह तोमर
5 अप्रैल 2026 गुना

**डेक हेडलाइन:**
मोहनपुर खुर्द में ईस्टर के नाम पर धर्मांतरण का खेल; झाड़-फूंक छुड़वाकर “यीशु की चंगाई” थमाई — अंधविश्वास से अंधविश्वास की ओर धकेले जा रहे गुना के आदिवासी, शासन मौन
—
**गुना, 5 अप्रैल 2026।**
“जहाँ गरीबी है, वहाँ अंधविश्वास है — और जहाँ अंधविश्वास है, वहाँ मिशनरी है।” गुना जिले के मोहनपुर खुर्द गाँव की ज़मीनी हकीकत इस एक वाक्य में सिमट जाती है। जिला मुख्यालय से महज 22 किलोमीटर दूर रविवार को ईस्टर के नाम पर दो बकरे और 40 मुर्गे काटकर भोज तैयार किया गया। 300-400 गरीब आदिवासियों को इकट्ठा किया गया — और “प्रार्थना से बीमारी ठीक होती है, प्रार्थना से नशा छूटता है” का वही पुराना पाखंड परोसा गया जो कभी ओझा-गुनिया परोसते थे। फर्क सिर्फ इतना है — वेशभूषा बदल गई, मंत्र बदल गए, लेकिन अंधविश्वास जस का तस है। और इस नए अंधविश्वास की कीमत है — आदिवासी की आस्था, उसकी पहचान और उसका धर्म।
**झाड़-फूंक से निराश हुए तो “चंगाई” का नया पाखंड थमाया**
इस पूरे खेल की सबसे शर्मनाक परत यहाँ है। मेहंदी बाई ने बताया — “पूरे देवी-देवता भी झाड़-फूंक कराए, लेकिन ठीक नहीं हुए। किसी ने कहा ईसा मसीह चंगा करते हैं।” संचालक ने खुद स्वीकार किया — “जादू-टोने के पास गए थे, आराम नहीं मिला।” यानी एक अंधविश्वास से मुक्त नहीं किया — बल्कि एक अंधविश्वास की जगह दूसरा अंधविश्वास बैठा दिया गया। पहले ओझा कहता था “मैं झाड़ दूँगा तो ठीक हो जाओगे” — अब पास्टर कहता है “प्रार्थना करो तो चंगे हो जाओगे।” दोनों पाखंड हैं — बस एक देशी है, एक विदेशी।
**बीमार को डॉक्टर नहीं, “चंगाई” दी — यह अपराध है**
ज्ञान सिंह के हाथ-पैर सूख गए थे। गीता बाई का एक्सीडेंट हुआ था। रुकमणी को शरीर में कमज़ोरी थी। इन सबको चाहिए था — डॉक्टर, अस्पताल, इलाज। इन्हें मिला — प्रार्थना, हालेलुया और “यीशु मसीह के नाम से चंगाई।” यह केवल धर्मांतरण नहीं, यह एक बीमार इंसान के साथ धोखा है। यह अंधविश्वास फैलाकर इलाज से वंचित रखना है। मध्यप्रदेश अंधविश्वास निवारण की बात करता है — तो क्या “प्रार्थना से बीमारी ठीक होती है” का यह दावा अंधविश्वास की श्रेणी में नहीं आता?
**”धर्म नहीं, मन परिवर्तन” — कानून से बचने की रटाई भाषा**
संचालक उत्तम कहते हैं — “धर्म तो कुछ नहीं, मन परिवर्तन।” रुकमणी कहती हैं — “ईसाई मतलब नहीं, परमेश्वर के पुत्र।” यह संयोग नहीं है। मध्यप्रदेश धर्म स्वातंत्र्य अधिनियम से बचने के लिए यह भाषा सोच-समझकर गढ़ी और रटाई गई है। जब एक गरीब आदिवासी महिला कानूनी बचाव की भाषा बोलने लगे — तो समझ लीजिए पर्दे के पीछे एक पूरा और सुनियोजित तंत्र काम कर रहा है।
**मिशनरी स्कूल की फैक्ट्री — अपने ही समाज को तोड़ने की ट्रेनिंग**
युवक विशाल की पढ़ाई दतिया के “नया जीवन मिशन स्कूल” में हुई। वह खुलकर कहता है — “ईसा मसीह के वचन गाँव-गाँव फैलाना चाहता हूँ।” बाहर से पैसा आता है, मिशनरी स्कूलों में स्थानीय आदिवासी युवा तैयार होते हैं और फिर वही युवा अपने ही समाज को तोड़ने का काम करते हैं। विशाल ने माना कि 20 साल पहले यहाँ ऐसा कुछ नहीं था। यह बदलाव अपने आप नहीं आया — इसके पीछे विदेशी धन और सुनियोजित मिशनरी रणनीति है।
**नेता वोट माँगने आते हैं, मिशनरी रोटी लेकर — असली ज़िम्मेदार कौन?**
एक कड़वा सच कहना ज़रूरी है। चुनाव आते हैं तो नेता मोहनपुर खुर्द का दरवाज़ा खटखटाते हैं। चुनाव जाते हैं तो न अस्पताल, न सड़क, न रोज़गार। जो खालीपन शासन ने छोड़ा, उसे मिशनरी तंत्र ने बकरे-मुर्गे के भोज और चंगाई के पाखंड से भर दिया। धर्मांतरण और अंधविश्वास रोकना है तो पहले यह पूछना होगा — आदिवासी इतना बेसहारा, इतना बीमार और इतना मजबूर क्यों है? असली अपराधी वह मिशनरी है जो शिकार करता है — या वह शासन है जो शिकार होने देता है?
**कानून है, पर लागू कौन करे?**
मध्यप्रदेश धर्म स्वातंत्र्य अधिनियम स्पष्ट कहता है — प्रलोभन देकर धर्मांतरण दंडनीय अपराध है। जिला मुख्यालय से 22 किलोमीटर पर खुलेआम सैकड़ों आदिवासियों को भोज देकर, चंगाई का पाखंड फैलाकर यह अपराध हो रहा है। एसडीएम कहाँ हैं? तहसीलदार कहाँ हैं? पुलिस कहाँ है? और सबसे बड़ा सवाल — जनप्रतिनिधि कहाँ हैं? यह चुप्पी लापरवाही है, या कुछ और — यह जाँच का विषय है।






