इंद्र की उंगली से अमृत की धारा फूट पड़ी। ‘माम’ और ‘धाता’ शब्दों के मेल से ही उस बालक का नाम ‘मान्धाता’ पड़ा।
जन्मदिन और विवाह वर्षगाँठ केवल उत्सव नहीं, अपितु अपनी संस्कृति, संस्कार और ‘स्व’ से जुड़ने का अवसर हैं।
गुना में धर्मांतरण का खेल अंधविश्वास की नई दुकान — बकरे-मुर्गे का भोज, चंगाई का पाखंड और टूटे आदिवासियों की आस्था का सौदा
मध्यप्रदेश में सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक पुनर्जागरण की नई दिशा — जामसांवली में श्री हनुमान लोक का प्रथम चरण लोकार्पित भोपाल/पांढुर्णा