भगवान विट्ठल विठोवा पंढरपुर भक्त के बस में है भगवान

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पुंडलिक हर दिन अपने वृद्ध माता-पिता की सेवा करते थे. इस दौरान वह हरे कृष्ण-हरे कृष्ण का जाप करते रहते थे.

 द्वारका न्यूज़

प्रधान संपादक विक्रम सिंह तोमर

वृद्ध और रोगी माता-पिता की सेवा उन्हें नहलाना-धुलाना और भोजन कराना इसके बाद पैर दबाकर उन्हें सुलाना उनकी रोज की दिनचर्या थी. यह सब करने के बाद वह बाकी समय कृष्ण भक्ति में लगाते थे. एक बार

रुक्मिणी जी ने कृष्ण जी से परीक्षा लेने को कहा रुक्मिणी के बार-बार कहने पर कृष्ण मान गए. एक दिन पुंडलिक जब अपने माता-पिता के चरण दबा रहे थे तो द्वार पर दस्तक हुई.

 

तब प्रभु ने ही स्नेह से पुकारा, \’पुंडलिक, हम तुम्हारा आतिथ्य ग्रहण करने आए हैं।\’

 

पुंडलिक ने जब उस तरफ दृष्टि फेरी, तो रुक्मिणी समेत सुदर्शन चक्रधारी को मुस्कुराता पाया।

 

उन्होंने पास ही पड़ी ईंटें फेंककर कहा, \’भगवन! कृपया इन पर खड़े रहकर प्रतीक्षा कीजिए। पिताजी शयन कर रहे हैं, उनकी निद्रा में मैं बाधा नहीं लाना चाहता। कुछ ही देर में मैं आपके पास आ रहा हूं।\’ वे पुनः पैर दबाने में लीन हो गए।

 

पुंडलिक ने श्रीकृष्ण को बैठने के लिए दी ईंट

कृष्ण को सामने खड़ा देखकर भी पुंडलिक ने पिता का पैर दबाना नहीं छोड़ा. उन्होंने बैठे-बैठे ही कृष्ण को प्रणाम किया और कहा- आइए प्रभु. बस कुछ देर रुकिए मैं पिता की सेवा कर लूं. फिर आपकी पूजा करता हूं. तब तक आप लीजिए यहां बैठ जाइए. ऐसा कहते हुए पुंडलिक ने श्रीकृष्ण की तरफ एक ईंट सरका दी.

 

पुंडलिक की सेवा और शुद्ध भाव देख भगवान इतने प्रसन्न हो गए कि कमर पर दोनों हाथ धरे तथा पांवों को जोड़कर वे ईंटों पर खड़े हो गए। किंतु उनके माता-पिता को निद्रा आ ही नहीं रही थी। उन्होंने तुरंत आंखें खोल दीं। पुंडलिक ने जब यह देखा तो भगवान से कह दिया, \’आप दोनों ऐसे ही खड़े रहे\’ और वे पुनः पैर दबाने में मग्न हो गए।

भगवान ने सोचा कि जब पुंडलिक ने बड़े प्रेम से उनकी इस प्रकार व्यवस्था की है, तो इस स्थान को क्यों त्यागा जाए? और उन्होंने वहां से न हटने का निश्चय किया।

इंतजार करते-करते कमर में दर्द हुआ तो वह कमर पर हाथ रखकर खड़े हो गए और कुछ टेढ़े हो गए. भगवान का यही रूप विट्ठल रूप विग्रह बनकर स्थापित हो गया.

पुंडलिक माता-पिता के साथ उसी दिन भगवत्‌धाम चले गए, किंतु श्रीविग्रह के रूप में ईंट पर खड़े होने के कारण भगवान \’विट्ठल\’ कहलाए और जिस स्थान पर उन्होंने अपने भक्त को दर्शन दिए थे, वह \’पुंडलिकपुर\’ कहलाया। इसी का अपभ्रंश वर्तमान में प्रचलित \’पंढरपुर\’ है।

 

महाराष्ट्र में विट्ठल को विठोबा भी कहा जाता और पंढरी, पंढरीनाथ, पाण्डुरंग, विट्ठल, विट्ठलनाथ आदि नामों से भी बुलाया जाता है।

भक्त का प्रभाव ऐसा कि भगवान को भी इंतजार करना पड़ा और वह विट्ठल विठोबा कहलाए. पंढरपुर में आज भी श्रीकृष्ण के विठोबा स्वरूप की पूजा की जाती है. जो कि याद दिलाती है कि भगवान से भी अधिक धरती पर भगवान के रूप माता-पिता की सेवा अधिक बड़ी है.

हर किसी के लिए जरूरी है कि वह अपने घर में बड़े-बुजुर्ग और माता-पिता की मन से सेवा करे. विश्वास बनाए रखें. यही सबसे बड़ी पूजा है.

Vikram singh tomar
Author: Vikram singh tomar

DWARKA NEWS NATIONAL NETWORK

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